बिरसा मुंडा की जीवनी, बिरसा आंदोलन 1899- 1900

ऐसा माना जाता है कि भारत में क्रांतिकारी और अंग्रेजो के खिलाफ ब्रिटिश सरकार का विरोध सबसे पहले बिरसा मुंडा द्वारा 1890 के आस-पास शुरू हुआ था।

बिरसा आंदोलन उन्नीसवीं सदी के आदिवासी आंदोलन में सर्वाधिक संगठित व व्यापक आंदोलन था जो वर्तमान झारखंड राज्य के खूंटी जिले के दक्षिणी भाग में 1899 से 1900 में हुआ था। इसे मुंडा उलगुलान जिसका हिंदी में शाब्दिक अर्थ होता है मुंडा महा विद्रोह जो सामूहिक भू स्वामित्व व्यवस्था का जमीन और जमींदार या व्यक्तिगत भू स्वामित्व व्यवस्था में परिवर्तन के विरुद्ध इस आंदोलन का उदय और बाद में बसा के धार्मिक राजनीतिक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था। बिरसा मुंडा आंदोलन सामूहिक भू स्वामित्व व्यवस्था का जमीन दारी या व्यक्तिगत भूस्वामी तत्व व्यवस्था में परिवर्तन की विरोध मैं इस आंदोलन का उदय हुआ और बाद में बिरसा के धार्मिक राजनीतिक आंदोलन के रूप में इसका व्यापक स्वरूप देखा जाता है।

बिरसा आंदोलन से जुड़े कुछ प्रमुख तथ्य

★ बिरसा के पिता का नाम – सुगना मुंडा

★ बिरसा की माता का नाम- कदमी मुंडा

★ बिरसा मुंडा का नामकरण- बिरसा मुंडा का नामकरण बिरसा मुंडा इसलिए रखा गया क्योंकि बृहस्पतिवार के दिन जन्म लेने के कारण बिरसा नाम रखा गया।

★ बिरसा मुंडा का बचपन का नाम – बिरसा मुंडा का बचपन का नाम दाऊद मुंडा था

★ विरसा के सबसे बड़े भाई का नाम – कौनता मुंडा था

★ बिरसा के आरंभिक शिक्षक का नाम जयपाल नाग था

★ विरसा के धार्मिक गुरु का नाम आनंद पंडा/ पांडे बंद कहां के जमींदार जगमोहन सिंह का मुंशी एवं वैष्णवी धर्म को मानने वाला था।

बिरसा मुंडा के प्रमुख विचार एवं सूत्र

● अनेक देवी देवताओं के अस्थान पर सिर्फ सिंह बंगा की आराधना करना

● उपासना के लिए मंदिर जाना आवश्यक नहीं उपासना के लिए सबसे उपयुक्त स्थल के रूप में गांव के सरना को मान्यता

● हिंसा का परित्याग व पशु बलि का निषेध

● हड़िया समेत सभी प्रकार के मध्य पान का निषेध

● जनेऊ धारण करना

★ विरसाइत धर्म – बिरसा मुंडा द्वारा प्रतिपादित या धर्म वास्तव में या मुंडा जाति की धार्मिक भावनाओं के साथ हिंदू धर्म एवं ईसाई धर्म के तत्वों का मिश्रण था।

बिरसा मुंडा की जीवनी

विरसा आभा, बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर, 1875 ई मैं झारखंड राज्य के रांची जिले के खूंटी अनुमंडल के तमाड़ थाना अंतर्गत उलीहातू गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम सुगना मुंडा था, बाद में उनका संपूर्ण परिवार चलकद गांव में जाकर बस गया यह गांव बाद में जाकर विरसा मुंडा के अनुयायियों के तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाने लगा। बिरसा मुंडा ने ईसाई धर्म प्रचारकों से शिक्षा ग्रहण की तथा इसके बाद उन पर वैष्णवी संप्रदाय का प्रभाव पड़ा और उनसे भी उन्होंने कुछ शिक्षा ग्रहण की।

1893-94 मैं बरसाने वन विभाग द्वारा ग्राम की बंजर जमीनों को अधिकृत करने के विरोध में आंदोलन में भाग लिया परंतु इस आंदोलन में वह मुंडा जनजाति को संगठित नहीं कर पाए, अगस्त 1895 में उसने एक नया धर्म सिंह बोंगा धर्म को शुरू किया जिससे वे धार्मिक स्तर पर लोगों को संगठित करना आरंभ कर दिया। उसने अनेक देवी-देवताओं को छोड़कर एक देवता सिंह बोंगा की आराधना करने का संदेश दिया। दूसरे शब्दों में एक ईश्वर बाद आत्मा शुद्ध हेतु उच्च स्तरीय नैतिक गुण विकसित करने के लिए कुछ सिद्धांत प्रस्तुत किए। साथ ही में उसने अपने आप को सिंह बोंगा का दूत घोषित किया और वह इस धर्म के प्रचार प्रसार में लग गए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सिंह बोंगा ने उन्हें किसी को निरोग करने की चमत्कारी शक्ति भी प्रदान की है। जिससे कि वे अनुयायियों को आवेद बना देंगे और शत्रुओं की बंदूक की गोलियों को पानी बना देंगे।

तत्कालीन परिस्थितियों एवं विभिन्न धर्मों के संपर्क नहीं बिरसा को भगवान बनाने में सहायता पहुंचाई, हजारों आदिवासी उसे देखने सुनने आने लगे। उसने अपने अनुयायियों को तीर और तलवार चलाने की शिक्षा की व्यवस्था भी की, अपने एक अनुयाई गया मुंडा को प्रशिक्षण का कार्य सौंपा तथा उसे सेना अध्यक्ष बनाया। बिरसा मुंडा ने बहुत ही जल्द लगभग 6000 समर्पित मुंडा ओं का दल तैयार कर लिया था। विरसा नेता बन गया और धार्मिक आंदोलन जल्दी खेती हारी मजदूरी के राजनीतिक आंदोलन में बदल गया। बिरसा मुंडा ने यह प्रचार किया कि जो भी मुंडा उनका साथ ना देंगे उनका नाश हो जाएगा। उसने ऐलान किया- अबुआ राज एटेजाना, महारानी राज टुंडू , यह मुंडारी में कहा गया उनका शब्द है। इसका हिंदी अर्थ यह होता है कि हम लोगों का राज शुरू हो गया है, और महारानी विक्टोरिया का राज समाप्त हो जाएगा।

इसके साथ ही बिरसा मुंडा ने अपने अनुयायियों को लगाना देने का भी आदेश दिया।

बिरसा आंदोलन के उद्देश्य

आर्थिक उद्देश्य – सभी बाहरी तथा विदेशी तत्वों को बाहर निकालना विशेषकर मुंडा ओं की जमीन हथियाने वाले जमींदारों को भगाना एवं जमीन को मुंडा ओं के हाथ में वापस लाना।

राजनीतिक उद्देश्य- अंग्रेजों के राजनीतिक प्रभुत्व को समाप्त करना तथा स्वतंत्र मुंडा राजकीय स्थापना करना।

धार्मिक उद्देश- ईसाई धर्म का विरोध करना तथा ईसाई बन गए असंतुष्ट मुंडा ओं को अपने धर्म में वापस लाना।

बिरसा मुंडा एक ऐसे आदर्श और न्याय पूर्ण समाज की स्थापना करना चाहते थे जो यूरोपीय और भारतीय शासकों से मुक्त हो। 1895 के अंत में बिरसा को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध यंत्र रचने के आरोप में 2 साल के लिए जेल भेज दिया गया। महारानी विक्टोरिया के शासन की हर एक जयंती के उपलक्ष में 30 नवंबर 1897 ई को बिरसा को हजारीबाग जेल से रिहा कर दिया गया रिहा होने के बाद उसके नेतृत्व को मुंडा राजनीति और जनजाति व सामाजिक स्वीकृति मिल गई। इसलिए उन्होंने और अधिक उत्साह के साथ अपनी गतिविधियों को और तेज कर दिया। विरसा गांव-गांव घूमकर मुंडा को हथियार बंद करने लगा खूंटी बिरसा के सैनिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। 1899 ई मैं क्रिसमस की पूर्व संध्या यानी कि 24 दिसंबर के दिन बिरसा मुंडा जाति का शासन स्थापित करने के लिए बिरसा मुंडा द्वारा विद्रोह का ऐलान कर दिया गया था। उसने इसके लिए ठेकेदारों, जागीरदारों, राजा, हकीमा और ईसाईयों का कत्ल करने का भी आह्वान किया। बिरसा मुंडा ने यह घोषणा करवाई की – ‘दिकू से अब हमारी लड़ाई होगी और उनके खून से जमीन इस तरह लाल होगी जैसे कि लाल झंडा’

इसके बाद क्या था उनके अनुयायियों ने अपने परम पारीक तीर कमान उसे आक्रमक गतिविधियां जारी कर दी और गिरजा घरों में आग लगाना प्रारंभ कर दिया। इस आंदोलन में महिलाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय देश की बड़े-बड़े अखबारों में भी इस बात की काफी चर्चा हुई।

बिरसा आंदोलनकारियों के ऊपर दमन

सन उन्नीस सौ के आसपास में आंदोलनकारियों ने पुलिस को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया था। इसके बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा इस पर कार्यवाही की गई और डोम बारी बुरु के पहाड़ों पर आदिवासियों द्वारा युद्ध हुआ। इस युद्ध में कमिश्नर फायरबेस व डिप्टी कमिश्नर स्ट्रीट फील्ड के हाथों आंदोलनकारियों की पराजय हुई।

ब्रिटिश सरकार द्वारा चलाए गए इस कार्यवाही में गया मुंडा इटकी में मारा गया। 3 फरवरी 1900 ई मैं बिरसा मुंडा सिंहभूम में पकड़ा गया। 9 जून 1900 ई को बिरसा मुंडा को रांची जेल में हैजा से मृत्यु हो गई। इसके पश्चात ब्रिटिश सरकार द्वारा लगभग 350 मुंडा आंदोलनकारियों पर मुकदमा चलाए गए जिनमें से तीन को फांसी की सजा और 44 को आजीवन कारावास की सजा तथा 47 को कड़ी सजा दी गई। सजा पाने वाले में मनकी मुंडा जो गया मुंडा की पत्नी थी का नाम उल्लेखनीय है। जिसे 2 साल की कड़ी सजा दी गई। बिरसा आंदोलन को ब्रिटिश सरकार ने पूरी तरह से कुचल दिया था पर आज भी भारत में बिरसा आंदोलन को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में जाना जाता है। और इस तरह बिरसा आंदोलन का दमन हुआ और भगवान बिरसा अमर हो गए।

बिरसा आंदोलन का परिणाम

हालांकि बिरसा आंदोलन स्वतंत्र मुंडा राजकीय स्थापना करने के लिए विफल साबित हुआ लेकिन 1902 में गुमला एवं 1903 में खूंटी को अनुमंडल के रूप में स्थापना किया गया। इसी के साथ ही 1908 में छोटानागपुर कस्तरी अधिनियम के द्वारा मुंडा ओं को कुछ राहत अवश्य मिली। वर्ष 1908 में पारित किया गया छोटानागपुर कस्तूरी अधिनियम द्वारा खुट खट्टी अधिकारों को पुनर्स्थापित किया गया। इसका परिणाम या देखने के लिए मिला कि बंधुआ मजदूरों पर प्रतिबंध लगाया गया साथ में लगान की दरें भी कम की गई। फादर हॉफ मैन नए 1908 के छोटानागपुर कस्तूरी कानून को मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए किया गया बहुत ही सराहनीय काम बताया है।

हालांकि बहुत सारे लोगों का कहना है कि बिरसा मुंडा एक राष्ट्रवादी नेता के रूप में उभर कर के आए, लेकिन बिरसा मुंडा के आंदोलन को आदिम समाज विरोधी कहने से इंकार नहीं किया जा सकता। मुंडा समाज आज भी उन्हें बिरसा भगवान, धरती आबा, विश्व पिता, आदि शब्दों से संबोधित करता है। बिरसा मुंडा की पवित्र समिति मुंडा ओं के हृदय में बनी हुई है। विरसा की वीरता और बलिदान की गाथा अनेक लोक कथा लोक गीत में अमर बन चुके हैं। वर्तमान समय में भी आदिवासियों में नए युग का प्रेरणा पुंज का कार्य करती है। बिरसा आंदोलन से मुंडा राज्य का सपना भले ही पूरा ना हो सका हो लेकिन विद्रोह की आग अंदर ही अंदर सुलगती रही। यही विद्रोह की आग पृथक झारखंड राज्य बनाने की प्रेरणा बन गई।

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